आज के भागमभाग भरे जीवन मे राहुल सान्क्रत्यायन प्रासगिक हो जाते है| घूमना जहा सेहत के लिये लभदायक व्यायाम है वही अपने देश ओर समाज को जानने का समझने का जरिया भी| वरना घर रहते वास्कोदिगामा कैसे जान पाते कि उनके देश के आगे भी कही दुनिया है|अगर कहा जाये कि राहुल सान्क्रत्यायन हमारे वास्कोदिगामा थे तो अतिश्योक्ति न होगी|लेकिन इतने भर से गर्व करने का कोइ आधार नही बनता|हमारे देश मे तमाम लोग है जिनका जीवन अपने घर ओर कार्यस्थ्ल तक सीमित है|मै भी उन्ही बहुसन्ख्यक लोगो की जमात का हिस्सा था| अपनी यात्रा से पहले| शाम हो रही थी लेकिन मै बाकि लोगो के साथ वार्ता मे शामिल होने को कतई तैयार न था क्योकि अगले दिन किसी काम से मुझे लखनऊ जाना था|यह मेरी पह्ली इतनी लम्बी यात्रा थी जिसमे मुझे पता लगता कि भारत की किताबो से इतर हकिकत मे आखिर क्या भोगोलिक स्थिति थी?दिल तो बागबाग था ही इसलिये काम को करने मे उस दिन अतिरिक्त आनन्द आ रहा था|अगले दिन रेल मे घुसते हुए मै अपने आपको दुनिया का सबसे खुशनसीब आदमी मह्शूस कर रहा था|मेरे पास यह सोचने का बिल्कुल भी वक्त नही था कि उस यात्रा को कर्ने वाला मै अकेला सख्श नही हू|खचाखच जमा लोगो के बीच मै अकेला आदमी था जिसे रेल के देर या जल्दी आने से कोइ खास मतलब नही था|आखिर जब गाडी पहूची तो उसके चलने के तरीके ने ही मुझे उतना रोमान्चित कर दिया जितना कि मै पहले कभी नही हुआ था| कुछ देर रुककर गाडी ने रफ्तार पकड ली|आसपास की चीजे उतनी रफ्तार से पीछे भाग रही थी|लेकिन मेरी उमन्गो की रफ्तार का कोइ पारावार न था|2-4 घटे बीते होगे की सूर्य नारायण पस्चिम मे कही गायब हो गये ओर मेरे लिये बाहर की मोहक छटा देखना असम्भव हो गया|
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